कहीं मनुष्य कुत्ते से भी गया – गुजरा तो नहीं?

हाल ही में रोम के पोप श्रीमान् फ्रांसिस ने अपने अनुयायियों से धार्मिक सहिष्णुता की आवश्यकता पर बल दिया। अलग – अलग धर्मों में भगवान् के विभिन्न नामों के विषय में उन्होंने कहा, “ये सब नाम उस एक व्यक्ति हैं जिसे विश्वभर में भिन्न – भिन्न नामों से पुकारा जाता है। सदियों से अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए मनुष्य ने अकारण ही दूसरों का रक्त बहाया है। परन्तु हमें इस सिद्धान्त हो समझकर मानवीय, राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर एकजुट होना चाहिए। यदि हम चाहें तो मिलकर अभूतपूर्व शान्ति की स्थापना कर सकते हैं। हमें केवल प्रत्येक धर्म का सम्मान करना है। यह समझना है कि चाहे हम भगवान् को किसी भी नाम से पुकारें हम सब एक भगवान् की संतान हैं।….”
अल्पबुद्धि लोग मानते हैं कि प्रत्येक धर्म के भगवान् अलग हैं। जरा सोचिए यदि प्रत्येक धर्म के भगवान् अलग हैं तो क्या ऊपर बैठकर उन भगवानों में स्पर्धा होती है कि किसके पास अधिक अनुयायी हैं? उन भगवानों ने सृष्टि के विभिन्न विभागों का बँटवारा किस प्रकार किया है? जैसे प्रकाश, जल, वायु, मौसम आदि विभाग। जिस प्रकार किसी देश में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के लिए चुनाव होते हैं, क्या उस प्रकार सब भगवानों में श्रेष्ठता के लिए चुनाव होते हैं?
जब कोई भगवान् दूसरे भगवान् के अनुयायियों द्वारा अपने अनुयायियों को मारते – पीटते देखता है तो क्या वह उस भगवान् से शिकायत करता होगा? उन भगवानों के बीच होने वाले झगड़ों को कौन सुलझाता है? क्या उनसे भी ऊपर कोई है? यदि है तो फिर इन भगवानों के भगवान् होने का क्या औचित्य? क्योंकि भगवान् शब्द का अर्थ ही है “ऐसा व्यक्ति जिसके न कोई बराबर हो और न उससे श्रेष्ठ।” यदि सब भगवान् अलग हैं तो सृष्टि में किसके नियम लागू होते हैं? जैसे कर्म के नियम, पाप – पुण्य के नियम इत्यादि।
अलग – अलग भगवान् होने की धारणा ऐसे अनेक उलझे हुए प्रश्नों को जन्म देती है।
वास्तव में जो लोग भगवान् मंे भेद देखते हैं वे अल्पज्ञानी हैं। सांसारी चेतना में व्यक्ति अहंकार के वशीभूत रहता है। वह स्वयं को तथा स्वयं से जुड़़ी प्रत्येक वस्तु को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करता है। उसे कोई अनुमान नहीं होता कि भगवान् कौन हैं, कैसे दिखते हैं, क्या करते हैं, उनके क्या गुण हैं, उनका क्या नाम है इत्यादि। वह भगवान् की मनोकल्पना करता है और अपने अहंकार के उल्लू को सीधा करने के लिए भगवान् का उपयोग करता है। बड़े – बड़े विद्वान् भी भगवान् की वास्तविकता से अनभिज्ञ रहकर अटकलें लगाते रहते हैं।
पिछली सदी के महान् संत श्रील भक्तिविनोद ठाकुर बताते हैं कि किस प्रकार भिन्न – भिन्न धर्म होना “एक भगवान्” की धारणा के विरूद्ध नहीं है। वे कहते हैं कि धर्मशास्त्र एक विशाल पर्वत के समान है और अनादि काल से विश्व के भिन्न – भिन्न संतों, भक्तों तथा दार्शनिकों ने इस पर्वत की गगनचुम्बी चोटियों को अपनी दिशाओं (दृष्टिकोणों) से देखा है। वे कहते हैं, “प्लेटो ने आध्यात्मिक प्रश्न की चोटी को पश्चिम से देखा और वेदव्यास ने पूरब से। कन्फ्यूसियश ने और आगे पूरब से, तथा शैलगेल, पिनोज़ा, कैंट तथा गोयथे ने और पश्चिम से इसे देखा। ये सब अवलोकन भिन्न – भिन्न समय पर भिन्न – भिन्न साधनों द्वारा किये गये, और चूँकि सबके अनुसंधान की विषय – वस्तु एक ही थी इसलिए इन सबका सार भी एक ही निकला। वे सब उस महान् व्यक्ति अथवा आत्मा की खोज में थे जो सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है। और उन्हें उसकी एक झलक मिली भी। उन सबके कहने का आशय एक ही है, हालाँकि उनके कहने की शैली अथवा शब्दों में भिन्नता हो सकती है। उन्होंने सर्वोच्च धर्म को खोजने के प्रयास किये और उन सबकी मेहनत रंग भी लायी, क्योंकि जब हम किसी वस्तु को प्राप्त करने के सच्चे प्रयास करते हैं तो हमारे पिता भगवान् उसमें निश्चित् हमारी सहायता करते हैं। इन सब दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत सार की सुन्दरता का अनुभव केवल स्पष्टवादी, उदार, पुण्यवान तथा पवित्र हृदय द्वारा ही किया जा सकता है।”
श्रील भक्तिविनोद आगे कहते हैं, “साम्प्रदायिकता अथवा मेेरे – तुम्हारे दल का भाव सत्य का सबसे कट्टर शत्रु है। जो जिज्ञासु केवल अपने राष्ट्र के धर्मग्रंथों से सत्य को बटोरने का प्रयास करेगा उसके प्रयास सदा विफल रहेंगे, और उसे विश्वास होने लगेगा कि परम सत्य केवल उसके धर्म की पुरानी पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं है…. परन्तु सत्य शाश्वत है, और अज्ञानता उसे केवल अस्थाई रूप से ही बाधित कर सकती है।”
सार यही है कि धर्म को संकुचित मानसिकता से नहीं वरन् उदार मानसिकता से समझा जा सकता है।
यदि एक कुत्ते का मालिक कभी कुर्ता पायजामा पहनकर, कभी सूट – बूट पहनकर या कभी लुंगी बाँधकर कुत्ते के सामने आये तो भी कुत्ता अपने स्वामी को महचानने मेें भूल नहीं करता। इसी प्रकार भगवान् एक हैं। वे भिन्न – भिन्न समय, परिस्थिति और स्थान पर भिन्न रूप लेकर प्रकट होते हैं। यदि मनुष्य उन बाह्य रूपों के पीछे अपने स्वामी भगवान् को नहीं पहचान पाता और अकारण अपने भाई – बहनों से कलह करता है तो क्या वह उस कुत्ते से भी गया – गुजरा नहीं माना जायेगा?

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