विष से विषैला

आज भारत भर में मैगी चर्चा का विषय बनी हुई है। दशकों से प्रायः प्रत्येक घर का यह मनपसंद खाना आज कटघरे में खड़ा है। और क्यों न हो? हमारे स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाली किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु को हम सहन नहीं कर सकते। आखिर जान है तो जहान है!

मैगी में बैठे हानिकारक तत्त्व हमारे शरीर को हानि पहुँचाते हैं। किन्तु क्या हमने कभी उन तत्त्वों के खिलाफ आवाज़ उठायी है जो हमारे मन, बुद्धि तथा आत्मा को हानि पहुँचाते हैं।

टी. वी. को लीजिए। गीता में भगवान् बताते हैं कि नरक के तीन दरवाजे होते हैं – काम, क्रोध और लोभ। ध्यान से देखिए टी.वी. की स्क्रीन इन तीन दरवाजों को खुला खेल है। उसमें प्रम्मुखतः स्त्री – पुरूष का आकर्षण, अत्यधिक हिंसा तथा विज्ञापनों के माध्यम से दर्शकों के मनों में काम, क्रोध तथा लालसाएँ उत्पन्न की जाती हैं। इंटरनेट का तो कहना ही क्या! सर्वे बताते हैं कि इंटरनेट का सर्वाधिक प्रयोग अश्लीलता देखने के लिए किया जाता है, जो हमारे मन को सबसे अधिक दूषित करता है। दूषित मन व्यक्ति का शत्रु बन जाता है और उसे नरक की ओर ले जाता है।

मीडिया ने हमारी भोगवृत्ति में ईंधन का काम किया है। अनावश्यक इच्छाओं को जन्म दिया है। कोई फिल्म अभिनेता बनना चाहता है, कोई मल्टी नेशनल  कम्पनी में उच्चपद चाहता है, कोई बाजार में आये नये इलैक्ट्रानिक्स उत्पादों को खरीदना चाहता है, कोई विश्वभर की यात्रा करना चाहता है आदि। सूची अन्तहीन है। और इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसे चाहे दूसरों पर अत्याचार, उनका षोषण अथवा अनैतिक कार्य ही क्यों न करना पड़े, वह सब करने के लिए तैयार रहता है। भोग के विचारों से आरम्भ होने वाली सड़क अन्ततः हमें पतन की ओर ले जाती है। श्रीकृष्ण गीता (2.62-63) में इसका वर्णन करते हैं –

“इन्द्रिविषयों का ध्यान करने से व्यक्ति की उनके प्रति आसक्ति विकसित हो जाती है, और वह आसक्ति काम को जन्म देती है, तथा काम से क्रोध का जन्म होता है। क्रोध से सम्मोह का जन्म होता है। क्रोध से सम्मोह का जन्म होता है और सम्मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है तो व्यक्ति का पुनः भौतिक अंधकूप में पतन हो जाता है।“

मन के दूषित होने से बुद्धि का पतन होता है, और बुद्धि के पतन से व्यक्ति अच्छे – बुरे की समझ खो देता है। फलतः उसकी आत्मा का पतन हो जाता है।

किन्तु विडम्बना कहिए कि न तो सरकार और न ही जनता इन हानिकारक तत्त्वों के विरूद्ध कोई आवाज़ उठा रही है। उल्टा इसे बढ़ावा देने को प्रगति, सुख तथा समृद्धि का चिह्न माना जा रहा है।

सरकार तथा अनेक संस्थाएँ दिखातीहै कि उन्हें नागरिकों की कितनी चिन्ता है। वे ऐसे किसी भी प्रयास का सिर कुचल देंगे जो नागरिकों के हित में नहीं है। किन्तु उन खाद्य पदार्थों का क्या जिनके बारे में सब जानते हैं कि वे हानिकारक है, जैसे शराब, मादक द्रव्य, सिगरेट, माँस इत्यादि। इंटनेट और टीवी पर भरे उन चित्रों और फिल्मों तथा उन समाचारपत्रों, उपन्यासों एवं साहित्य का क्या जो लोगों की चेतना को अत्यन्त संकुचित तथा स्वार्थी बना रहे है?

यह दर्शाता है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वंय को शरीर और उसके तात्कालिक सुख को ही जीवन का लक्ष्य मान रहा है। संस्कृत में इसे प्रेयस् कहते हैं। इसके विपरीत है श्रेयस्, अर्थात् चिरकालीन सनातन सुख। किन्तु मनुष्य को उसका कोई ज्ञान नहीं है। जिस प्रकार विषेषज्ञों ने मैगी में छिपे हानिकारक तत्त्वों को खोज निकाला है, उसी प्रकार प्राचीन ज्ञानियों ने खोज निकाला है कि प्रेयस् हेतु किये गये कार्यों में दुःख का कारण छिपा बैठा है।

श्रील प्रभुपाद लिखते हैं –

शास्त्रों में श्रेयस् और प्रेयस् का वर्णन किया गया है। श्रेयस् अर्थात् हमारा चरम लक्ष्य। हमें इस प्रकार कार्य करना चाहिए जिससे हम सदा के लिए सुखी हो सकें। किन्तु यदि हम तात्कालीक सुख के पीछे भागेंगे तो हमारा भविष्य दुःखमय होगा। वह प्रेयस् है। अल्पबुद्धि लोग तथा बच्चे प्रेयस् के पीछे भागते हैं। बच्चा दिनभर खेलना चाहता है। उनकी पढ़ाई – लिखाई में रूचि नहीं होती। चूँकि पढ़ने – लिखने से उसे भविष्य में लाभ होगा इसलिए वह श्रेयस् है। किन्तु आजकल कोई श्रेयस् नहीं चाहता। शास्त्रों में निर्देष दिया गया है कि हम श्रेयस् के लिए प्रयास करें और प्रेयस् द्वारा प्रलोभित न हों।

(भगवान् कपिल का शिक्षामृत)

गीता में भगवान् प्रेयस् को रजोगुणी बताते हैं, अर्थात जो आरम्भ में अमृत जैसा लगता है किन्तु उसका अन्त विषैला होता है। इसके विपरीत श्रेयस् सतोगुणी होता है, अर्थात आरम्भ में वह विष जैसा लगता है किन्तु उसका अन्त अमृतमय होता है।

मैगी में पाया गया विष षायद इतना विषैला नहीं होगा जितना प्रेयस् कार्यों का विष। उसमें न केवल हमारे षरीर को, अपितु हमारे मन, बुद्धि तथा आत्मा को नष्ट करने की शक्ति होती है।

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