भगवान् शिव

प्रश्न – भगवान् श्री कृष्ण के भक्त, भगवान् शिव का किस तरह सम्मान करते हैं ?

उत्तर – कहा जाता है कि वैष्णवानां यथा शम्भू: – शिवजी समस्त भक्तों में श्रेष्ठ हैं। अतः भगवान श्री कृष्ण के सारे भक्त शिवजी के भी भक्त हैं। वृन्दावन में शिवजी का एक मंदिर है, जिसे गोपीश्वर कहते हैं। गोपियाँ न केवल शिव की उपासना करती थीं, अपितु कात्यायनी या दुर्गा की भी करती थीं। किन्तु उनका एकमात्र लक्ष्य श्री कृष्ण की कृपापात्र बनना था। भगवान कृष्ण का भक्त शिवजी का कभी भी अनादर नहीं करता, प्रत्युत कृष्ण के परम भक्त के रूप में उनकी पूजा करता है। अतः जब भी कोई भक्त शिवजी की आराधना करता है तो वह उनसे उसे कृपाभाजन बनाने की प्रार्थना करता है, वह उनसे भौतिक लाभ नहीं माँगता। भगवद्गीता (7.30) में कहा गया है कि सामान्यतः लोग देवताओं की पूजा भौतिक लाभ के लिए करते हैं, किन्तु भक्त ऐसा नहीं करता , क्योंकि वह कामाभिभूत कभी नहीं होता। असुर शिवजी की पूजा करता है, वह कोई न कोई वर प्राप्त करता है, उसका दुरुपयोग करता है और अंत में भगवान के हाथों मारा जाता है। भगवान ही उसे मुक्ति प्रदान करते हैं।
श्रीमद्भागवतम 4.24.30

प्रश्न – भूतों और भगवान् शिव में क्या सम्बन्ध है ?

उत्तर -शिवजी या रुद्र भूतों के राजा हैं। भूतगण शिवजी की इसलिए पूजा करते हैं कि धीरे धीरे वे आत्म-साक्षत्कार के मार्ग पर अग्रसर हो सकें। मायावादी दार्शनिक अधिकांशतया शिवजी के पूजक होते हैं और श्रीपाद शंकराचार्य को शिवजी का अवतार मान लिया जाता है, जो मायावादी दार्शनिकों को ईशविहीनता (नास्तिकता) का उपदेश देते हैं। भूतों के भौतिक शरीर नहीं होते, क्योंकि वे आत्महत्या जैसा घोर पापकर्म किये रहते हैं। मानव समाज में भूतवत पात्रों का अंतिम गंतव्य यह है कि वे भौतिक या आध्यात्मिक आत्महत्या की शरण लें। भौतिक आत्महत्या से भौतिक शरीर की और आध्यात्मिक आत्महत्या से व्यष्टि स्वरूप की हानि होती है। मायावादी दार्शनिक अपने व्यष्टित्व को खोकर निर्विशेष आध्यात्मिक ब्रह्मज्योति के अस्तित्व में लीन होना चाहते हैं। शिवजी भूतों पर अत्यधिक कृपालु होने के कारण इस ताक में रहते हैं कि निन्दित होने पर भी इन भूतों को भौतिक शरीर प्राप्त हो। वे उन्हें ऐसी स्त्रियों के गर्भ में स्थापित करते हैं जो परिस्थिति तथा काल के प्रतिबंधों की परवाह न करके संभोगरत होती हैं।
श्रीमद्भागवतम 3.14.24 तात्पर्य

प्रश्न – स्त्रियाँ इतनी मात्रा में भगवान् शिव की उपासना क्यों करती हैं ?
उत्तर -आज भी हिन्दू समाज में अविवाहित लड़कियों को शिवजी की पूजा करने के लिए कहा जाता है, जिससे उन्हें उनके समान पति मिले। शिवजी ऐश्वर्य या इन्द्रीयतृप्ति से नहीं वरन भक्तों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण आदर्श पति हैं। वैष्णवानां यथा शम्भू: – शम्भू या शिवजी आदर्श वैष्णव हैं। वे भगवान राम का निरंतर ध्यान करते हैं और हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे मंत्र का जप करते रहते हैं। शिवजी का एक वैष्णव सम्प्रदाय है, जो विष्णुस्वामी सम्प्रदाय कहलाता है। अविवाहित कन्याएँ शिवजी की पूजा इसलिए करती हैं जिससे उनके समान ही वैष्णव पति प्राप्त हो। लड़कियों को कभी भी धनी या ऐश्वर्यवान पति चुनने की शिक्षा नहीं दी जाती, किन्तु यदि लड़की इतनी भाग्यवान होती है कि उसे शिवजी के समान उत्तम भक्त पति प्राप्त हो तो उसका जीवन सफल हो जाता है। पत्नी अपने पति पर आश्रित होती है और यदि पति वैष्णव हुआ तो वह अपने पति की भक्ति में हिस्सा बँटाती है क्योंकि वह उसकी सेवा करती है।
– श्रीमद्भागवतम 3.23.1 तात्पर्य

प्रश्न – भगवान् शिव के शरीर पर सर्प क्यों विद्यमान रहते  हैं ?
उत्तर -मिथ्या अहंकार से मुक्ति पाने के लिए संकर्षण की पूजा करनी होती है। संकर्षण की पूजा शिवजी के माध्यम से भी की जाती है। शिवजी के शरीर में लिपटे रहने वाले सर्प संकर्षण के ही रूप हैं और शिवजी सदैव संकर्षण के ध्यान में तल्लीन रहते हैं। जो कोई संकर्षण के ही भक्त रूप में शिवजी की पूजा करता है वह मिथ्या अहंकार से मुक्त हो सकता है।
– श्रीमद्भागवतम 3.26.22 तात्पर्य

प्रश्न – भगवान् शिव की स्थिति ?
उत्तर -वामन पुराण में कहा गया है कि वही विष्णु विभिन्न गुणों के निर्देशन करने के लिए ब्रह्मा तथा शिव के रूप में अपना विस्तार करते हैं।

महेश्वर या शिवजी न तो सामान्य जीव हैं और न ही भगवान विष्णु के बराबर हैं। ब्रह्म-संहिता में विष्णु तथा शिव की अच्छी तरह तुलना करते हुए कहा गया है कि विष्णु दूध के समान हैं और शिव दही के समान है। दही दूध की तरह नहीं होता किन्तु फिर भी यह दूध ही होता है।

– चैतन्य चरितामृत , आदि लीला 5.104-105 तात्पर्य

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