नरक की मौज

श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वरती ठाकुर (1874-1937) के अन्तर्धान होने के पश्चात् उनके शिष्यों  ने सरस्वती ठाकुर द्वारा लिखे पत्रों एवं पुस्तकों तथा प्रवचनों से कुछ उपदेशक कथाओं का संकलन किया। उन्होंने इस पुस्तक का नाम रखा – उपाख्याने उपदेश। इन सरल लघु कथाओं के माध्यम से उन्होंने कृष्णभावनामृत  के विभिन्न सिद्धान्तों को प्रबलता से स्थापित किया। उनके शिष्य श्रील ए.सी.भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद अकसर अपने प्रवचनों एवं पुस्तकों में इनका वर्णन करते हैं।

आईये हम उसी संकलन में  से एक कहानी पढ़ते हैं –

एक बार एक पुण्यवान ब्राह्मण ने एक शराबी को उपदेश देते हुए कहा, “देखो! कम से कम तुम अपनी भलाई के लिए तो शराब छोड़ दो। शास्त्रों में बताया गया है कि शराब पीने वाला नरक में जाता है।”

शराबी ने उत्तर दिया, “किन्तु सूरेन बाबू शराब पीते हैं।”

ब्राह्मण ने कहा, “वे भी नरक में जायेंगे।”

शराबी ने कहा, “वरूण बाबू भी शराब पीते है!”

ब्राह्मण ने कहा, “हाँ, वे भी नरक में जायेंगे।”

शराबी ने कहा, “किन्तु अरूण बाबू भी इसे पीते हैं!”

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “वे भी नरक में जायेंगे। जो भी शराब पीयेगा निश्चित ही नरक में जायेगा।”

फिर शराबी ने पूछा, “ और क्या-क्या करने से नरक में जाना पड़ता है।”

ब्राह्मण ने बताया, “झूठ बोलना, चोरी करना, धोखा देना एवं व्यभिचार करने जैसे कार्य नरक में ले जाते हैं।”

तब शराबी ने पूछा, “फिर भामिनी वैश्या का क्या होगा ?”

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “नरक।”

शराबी एक क्षण के लिए रूका और फिर पूछा, “जो भी वैश्या है वह नरक में जायेगी ?”

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “हाँ।”

शराबी ने फिर प्रष्न पूछा, “और जो वैश्याओं के पास जाते हैं वे कहाँ जायेंगे ?”

ब्राह्मण ने कहा, “नरक में ही।”

यह सुनते ही शराबी खुषी-खुषी मुस्काने लगा और अपने-आप से बोलने लगा, “अरे! फिर तो नरक में बहुत धूम-धड़ाका रहेगा! यदि इतने सारे लोग नरक में जायेंगे तो वहाँ बड़ा मजा आयेगा!”

तात्पर्य

इस भौतिक संसार में अनेक लोग सोचते हैं कि यदि बहुत सारे लोग असीमित रूप से एक ही घृणित पाप कर रहे हैं तो इसमें घबराने की बात नहीं है। वास्तव में इस संसार में अधिकतर जीवात्मायें ऐसी हैं जो भगवान् की भक्ति को गम्भीरता से नहीं लेती। परिणामस्वरूप, हो सकता है कि विषयी और पाशविक प्रवृत्ति का बहुपक्ष भगवान् की भक्ति की उपेक्षा करे और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वे भी अन्य नास्तिकों के समान ही गति प्राप्त करेंगे। “इसलिए कुछ संतो के पास जाकर उनके अच्छे उपदेश  सुनने का क्या लाभ! अच्छा होगा यदि हम बहुपक्ष में ही रहें।”

इस प्रकार अधिकतर लोग भगवान् की भक्ति के विरूद्ध ही रहते हैं। यह केवल उनके रजोगुण को ही दर्शाता है।

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