गंगा का तट

एक लम्बी पारी खेलकर सचिन ने अन्ततः मैदानी क्रिकेट से संन्यास ले लिया। हर सच्चे भारतीय को उनपर गर्व है। एक ओर सरकार तथा अनेक संस्थाओं ने नाना प्रकार से इस नायक को महिमामण्डित किया तो दूसरी ओर उनके प्रशंसकों ने उन्हें क्रिकेट के भगवान्” की उपाधि दे डाली।
यदि आप सचिन ने फैन हैं तो जरा एक प्रश्न पर विचार कीजिए। क्या आप सचिन के प्रशंसक हैं अथवा उसके खेल-प्रदर्षन के अर्थात यदि सचिन इस खेल की इन ऊँचाइयों पर न पहुँचकर एक साधारण मुम्बई-निवासी होते तब भी क्या आप उनके प्रशंसक होते ?
जी, बिल्कुल नहीं।
इस संसार में ऐसे छह गुण हैं जो हमें दूसरों के प्रति आकर्षित करते हैं। बल, यष, धन, सौन्दर्य, ज्ञान और वैराग्य।
शायद सुनने में कठोर लगेगा, परन्तु सच्चाई यह है कि इस दुनिया में हमारा आकर्षण किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति नहीं होता, अपितु उसके इन छह गुणों अथवा ऐश्वर्यों के प्रति होता है। और जैसे ही वह व्यक्ति उनऐश्वर्यों से विहीन हो जाता है, हमारा आकर्षण भी क्षीण हो जाता है। भारतीय सिने जगत गवाह है उन सितारों का जिनपर एक समय उनके प्रशंसक जान न्यौछावर करते थे, परन्तु अपनी चमक फीकी पड़ले के बाद जिन्होंने अत्यन्त अकेला और लाचारीभरा जीवन जीया।
यह सोचना भ्रम है कि मैं किसी अमुक व्यक्ति का प्रशंसक हूँ, अथवा लोग मेरे प्रशंसक हैं। हमारा आकर्षण केवल इन उपर्युक्त छह ऐश्वर्यों के प्रति होता है।
वास्तव में हम सब इन ऐश्वर्यों के प्रति आकर्षित होना चाहते हैं। परन्तु नहीं जानते कि आपनी इस कामना की सर्वोच्च पूर्ति कहाँ करें। वैदिक षस्त्रों के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण इन छह ऐष्वर्यों को असीमित मात्रा में धारण करते हैं, और उनके ये ऐष्वर्य कभी क्षीण नहीं होते। जब हम किसी व्यक्ति के धन, ज्ञान, बल आदि द्वारा आकर्षित होते हैं तो हम उन ऐश्वर्यों से आकर्षित होते हैं जो मूल रूप से केवल भगवान् की सम्पत्ति हैं। दूसरे षब्दों में सचिन के प्रति हमारा आकर्षण अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण के प्रति हमारे आकर्षण को दर्शाता है।
जब हम सांसरिक लोगों के ऐश्वर्यों से आकर्षित होकर सुख खोजते है तब हम स्वयं को धोखा देते हैं। ऐसे लोग एक-न-एक दिन इन ऐश्वर्यों से विहीन हो जाते हैं और हमें पुनः अपने नये “भगवान्” की खोज आरम्भ करनी पड़ती है।
सृष्टि के प्रत्येक जीव अथवा वस्तु में हमें जो भी गुण दिखायी देता है, वह उन्होंने भगवान् से उधार लिया हुआ है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं –

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोऽंषसम्भम्।।

“अर्जुन यह जान लो कि इस सृष्टि में हो भी ऐश्वर्यशाली , सुन्दर तथा यशस्वी वस्तु दिखायी देती है वह मेरे तेज का अंश मात्र है।” (गीता 10.41)

एक समय था जब हम सब जीव भगवान् के साथ उनके धाम में निवास करते थे। उस समय हम सदैव उनके बल, सुन्दर रूप, ज्ञान, यश, धन तथा वैराग्य जैसे गुणों से मोहित रहते हुए सुखद एवं सन्तुष्ट जीवन यापन कर रहे थे। अकल्पनीय रूप से हमारे अन्दर प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया और फलस्वरूप हम इस भौतिक संसार में आ गिरे। परन्तु हमारी सुप्त चेतना में उनके इन छह ऐश्वर्यों की छाप इतनी गहरी जमी है कि हमने उन गुणों की खोज इस नश्वर संसार में भी जारी रखी हुई है।

यह उसी प्रकार है जैसे गंगा नदी के तट पर रहने वाले व्यक्ति को मरूभूमि में छोड़ने पर उसे सर्वत्र पानी का भ्रम दिखाई देता है।

जैसे ही हम किसी व्यक्ति में इन ऐश्वर्यों को देखते हैं हम उससे आकर्षित हो जाते हैं और उसके “फैन” बनकर वही सुख और सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहते हैं जो एक समय हम श्रीकृष्ण के संग में प्राप्त कर रहे थे। कितना दुर्भाग्य है। मरूभूमि की मृग-मरिचिका से भला किसकी प्यास बुझी है?

हम भी सचिन के इस ऐश्वर्य की प्रशन्सा करते हैं, परन्तु इस समझ के साथ कि वह भगवान् श्रीकृष्ण के असीमित ऐश्वर्य का मात्र अंश है। हो सकता है कि सचिन ‘क्रिकेट के भगवान्‘ हों, परन्तु श्रीकृष्ण ऐसे असंख्य भगवानों के भी भगवान् हैं।

जब हम अपने एवं अन्यों के ऐश्वर्यों की भगवान् की ऐश्वर्य का अंश मान लेते हैं तब हमारा जीवन सहज हो जाता है। हमें अपने ऐश्वर्यों पर गर्व नहीं होता तथा दूसरों के ऐश्वर्यों से ईर्ष्या नहीं होती। उस समय हमें इस संसार के गर्हित जीवों में सुख ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती। हम इस तप्त मरूभूमि को छोड़कर पुनः श्रीकृष्ण के शीतल मधुर चरणकमलों पर लौट आते हैं। हमारी खोज पूरी हो जाती है।

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