क्या आपने अपना धनुष तोड़ दिया है?

किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को उसके अनुकूल कार्यों का ध्यान रखना होता है। अनुकूल कार्यों को स्वीकार करना और प्रतिकूल को त्यागना। इन्हें स्वीकारने अथवा त्यागने में कितनी भी कठिनाई क्यों न हो, सफलता के लिए इन्हें करना अनिवार्य हो जाता है।

मोटे तौर पर इसे तपस्या कहा जाता है; ऐसे कार्य जिन्हें करने के लिए हमारा मन अनुमति नहीं देता, परन्तु उनमें अपना हित देखकर बुद्धि की सहायता से हम उन्हें करते हैं। छात्र परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए रातभर जगकर अध्ययन करते हैं और खेलकूद छोड़ देते हैं, खिलाड़ी पदक जीतने के लिए संयमित आहार करते हैं, व्यापारी धन कमाने के लिए अपनी सेहत दाव पर लगा देते हैं आदि।

भक्ति-पथ पर भी साधक से ऐसी अपेक्षायें की जाती हैं। युगों पूर्व पुरानी घटना है। एक समय नारदमुनि एक वन से गुजर रहे थे। यहाँ-तहाँ अधमरे पषुओं को कराहते देखकर उनका हृदय विदीर्ण हो गया। कुछ दूर चलने पर उनकी भेंट उस षिकारी से हुई जिसने उन पषुओं की वह दुर्गति की थी। उसका नाम था मृगारि। हाथ में धनुष-बाण लिये उसने नारदमुनि को प्रणाम किया, हालाँकि मन-ही-मन वह खिन्न था कि नारदमुनि के आने कुछ षिकार भाग निकले थे।

आश्चर्यजनक रूप से नारदमुनि ने उससे पषुहत्या बन्द करने के लिए नहीं कहा। उन्होंने बस यही कहा कि मृगारि उन पषुओं को आधा न मारकर पूरा मारे। चूँकि मृगारि के मन में नारदमुनि के प्रति सम्मान था, इसे देखकर नारदमुनि ने उसे ज्ञान देना आरम्भ किया। अन्त में जब मृगारि को कुछ-कुछ बात समझ आयी तो उसने नारदमुनि से पूछा, “ठीक है, तो मुझे क्या करना चाहिए?”

नारदमुनि ने उत्तर दिया, “सबसे पहला अपना धनुष तोड़ दो।”

यह सुनकर मृगारि भौंचका रह गया। “यह धनुष मेरी जीविका का एकमात्र साधन है। यदि इसे तोड़ दूँगा तो अपने परिवार का पालन कैसे करूँगा?”

नरदमुनि ने उसे आष्वासन दिया कि वे प्रतिदिन उसके भोजन की व्यवस्था करेंगे। मृगारि को नारदमुनि पर पूरा विष्वास था। दोनों छोर से धनुष को पकड़कर उसने उसे घुटने से नीचे दबाया और एक झटके में उसके दो टुकड़े कर डाले। यह षेष इतिहास है कि किस प्रकार वह क्रूर षिकारी इतना कोमल हृदय वैष्णव बन गया कि भूमि पर चलती चींटियों को कष्ट पहुँचाने में भी उसे संकोच होता था।

इस्काॅन के आरम्भिक दिनों में श्रील प्रभुपाद ने एक भक्त को लकड़ी तारषकर भगवान् जगन्नाथ की मूर्ति बनाने के लिए कहा। एक दिन जब श्रील प्रभुपाद कार्य-प्रगति को देखने उस भक्तके घर पहुँचे तो वह भक्त मूर्ति बनाते हुए सिगरेट पी रहा था। श्रील प्रभुपाद ने केवल इतना कहा, “इस छोटी-सी सिगरेट को अपने और भगवान् के बीच मत आने दो।” उसी क्षण उस भक्त ने अपना ‘धनुष‘ तोड़ दिया; अर्थात् सिगरेट छोड़ दी।

जीवन में यह परिवर्तन लाने के लिए हमें भी अपने-अपने धनुष तोड़ने होंगे। अर्थात् प्रतिकूल कार्यों को त्यागना होगा। ये कार्य सबके लिए अलग-अलग हो सकते हैं। हो सकता है कि आप कुछ ऐसी व्यंजन खाने से आसक्त हों जो कृष्णभक्ति के प्रतिकूल हैं; अथवा आवष्यकता से अधिक इंटरनेट या टी.वी. से आसक्त हों, या ऐसे किसी भी कार्य से आसक्त हों जो आपके और कृष्णभक्ति के बीच दीवार बना खड़ा हो।

सर्वप्रथम अपनी आसक्तियों को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना एक बड़ी चुुनौती है। फिर उन्हें त्यागने का दृढ़ निष्चय करना उससे भी बड़ी चुनौती है। फिर उन्हें त्यागने का दृढ़ निष्चय करना उससे भी बड़ी चुनौती है। फिर उन्हें त्यागने का दृढ़ निष्चय करना उससे भी बड़ी चुनौती है। फिर उन्हें त्यागने का दृढ़ निष्चय करना उससे भी बड़ी चुनौती है। सांसारिक आसक्तियाँ हमें सुख की एक अनुभूति देती हैं। वास्तव मेें हम उस अनुभूति से आसक्त होते हैं, और डरते हैं कि धनुष तोड़ने पर उन अनुभूतियों से वंचित हो जायेंगे। चाह कर हम अपना धनुष तोड़ नहीं पाते। गीता (३.) में इसे ही काम कहा गया है।

धनुष का तोड़ा जाना ही आध्यात्मिक जीवन का षुभारम्भ है।

यह गुरू और षिष्य के बीच एक अनुबंध के समान है। षिष्य गुरू पर विष्वास रखकर अपनी आसक्तियों को छोड़ने का प्रण लेता है, और षिष्य की गम्भीरता को देखकर गुरू उसके मार्गदर्षन का उत्तरदायित्व लेता है।

श्रील प्रभुपाद मृगारि द्वारा धनुष तोड़े जाने की तुलना दीक्षा से करते हैं – “यही दीक्षा है। षिष्य को प्रतीज्ञा लेनी चाहिए कि वह व्यभिचार, माँसाहार, नषा और जुए पापकार्यों को त्याग देगा। वह गुरू के आदेष-पालन का वचन देता है। और तब गुरू आध्यात्मिक पथ पर उसका मार्गदर्षन करके उसे आगे ले जाते हैं।”

भौतिकवाद से अध्यात्म की ओर छलांग लगाने के लिए आज नही ंतो कल हमें यह धनुष तोड़ना ही होगा। हम जितनी देर करेंगे, उतनी हानि उठानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। विष्वास रखिए, उस धनुष के टूटते ही आप भगवान् को पहले से कहीं अधिक अपने निकट पायेंगे।

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