एकलव्य : गुरूभक्त या गुरूद्रोही?

यदि एकलव्य के मन में गुरू के प्रति इतनी निष्ठा थी तो उसने उसके पहले आदेश  का उल्लंघन क्यों किया?

अधिकांश लोग एकलव्य की गुरूभक्ति को आदर्श मानते हैं। परन्तु अकसर वे एकलव्य की चेतना में बैठे एक प्र्र्रमुख दोष को नहीं देख पाते। गुरूभक्ति का मुखौटा पहनकर वास्तव में एकलव्य ने गुरू के प्रति विद्रोह किया। चाहे निम्नकुल में जन्म का कारण हो या उसकी परीक्षा लेने के लिए, जब उसके गुरू द्रोणचार्य ने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना किया तो उस समय एकलव्य का एकमात्र कर्तव्य था कि वह अपने गुरू के निर्देश का पालन करता। परन्तु एकलव्य को गुरू का निर्देश अच्छा नहीं लगा। वह महान् धनुर्धारी बनना चाहता था। बाह्य दृष्टि से गुरू के बिना उसके कार्य को मान्यता प्राप्त नहीं होती, अथवा यूँ कहिए कि गुरू के बिना महान् धनुर्धारी बनना सम्भव नहीं था। इसीलिए एकलव्य ने मिट्टी से अपने गुरू की प्रतिमा बनायी।

इस प्रकार वह अपनी इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने के लिए महान् धनुर्धारी बनना चाहता था। वह गुरू की इच्छा जानकर बलिदान नहीं करना चाहता था।

कुछ लोग कहते हैं कि जब द्रोणाचार्य ने गुरू – दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँगा तो एकलव्य ने उनके इस क्रूर आदेश  का पालन किया। यह उसकी गुरूभक्ति का प्रतीक है। परन्तु यदि ध्यानपूर्वक इस विषय को देखा जाये तो हम पायेंगे कि एकलव्य अलौकिक भक्ति के स्थान पर लौकिक नैतिकता को अधिक मूल्य देता था। गुरू – दक्षिणा देना सामान्य शिष्टाचार  और नैतिकता है। केवल इस नैतिकता के कारण एकलव्य ने अपना अँगूठा दे दिया। वह उसने गुरू के प्रति प्रेम या भक्ति से प्रेरित होकर नहीं किया। (यदि वह इतना बड़़ा गुरूभक्त था तो उसे गुरू की पहली आज्ञा का पालन करना चाहिए था।)

भक्ति सरल एवं स्वाभाविक होती है। यदि एकलव्य की गुरू, वैष्णव तथा भगवान् में निष्ठा होती तो उसके गुरू (द्रोणचार्य), वैष्णव शिरोमणि (अर्जुन) तथा भगवान् श्रीकृष्ण उसके व्यवहार से खिन्न नहीं होते। एकलव्य धनुर्वेद सीखना चाहता था और उसके गुरू ने उसकी इस इच्छा को स्वीकार नहीं किया। एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ बनना चाहता था। वैष्णवों से श्रेष्ठ बनने की इच्छा भक्ति नहीं है। वह इच्छा भक्ति के विरूद्ध है।

संसारिक दृष्टि से महान् बनने की इच्छा अच्छी मानी चाती है। परन्तु भक्ति का अर्थ है वैष्णवों के अधीन रहना। उनके पीछे रहना। वैदिक ज्ञान को प्रामाणिक गुरू के आश्रय में सीखा जाता है। अर्जुन सविधि यह ज्ञान सीख रहे थे। और एकलव्य चाहता था कि वह वैदिक ज्ञान सीखने की प्रामाणिक विधि से ऊपर उठ जाये। अर्जुन ने एकलव्य की मानसिकता में बैठे इस दोष को इंगित किया। यदि अर्जुन दयावश ऐसा नहीं करते तो निराकारवाद फैल जाता। लोग प्रामाणिक गुरू का आश्रय लिए बिना किसी भी काल्पनिक या अप्रामाणिक गुरू की मूर्तियाँ बनाकर ज्ञान सीखने लगते।

अर्जुन इस नास्तिकवादी विचारधारा का खण्डन करना चाहते थे। अर्जुन के मन में एकलव्य के प्रति द्वेष नहीं था। वह तो वस्तुतः एकलव्य तथा संसार के प्रति उनकी करूणा थी। यदि एकलव्य गुरू का सच्चा भक्त होता तो भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे गुरूभक्त का वध नहीं करते। श्रीकृष्ण सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते है। परन्तु एकलव्य को श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने हाथों से मारा। इस प्रकार एकलव्य का अन्त हुआ। श्रीचैतन्य महाप्रभु कहा करते थे कि भक्तों को तपस्या के आधार पर नहीं तोला जा सकता। कई बार असुर देवताओं से अधिक घोर तप करते हैं और अपने शरीरको अत्यधिक कष्ट देते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे महान् बन गये हैं।

एकलव्य अपने गुरू की इच्छा के विरूद्ध एक वैष्णव से महान् बनना चाहता था। इसलिए श्रीकृष्ण के हाथों मृत्यु प्राप्त करके उसने निराकार ब्रह्मज्योति में प्रवेश किया। केवल असुरों को श्रीकृष्ण के हाथों मृत्यु प्राप्त होती है। भक्तों की तो श्रीकृष्ण स्वयं रक्षा करते है। हिरण्यकश्यपु और प्रह्लाद इसके प्रमाण हैं। इसलिए हमें कभी भी गुरूभक्ति का मुखौटा  पहनकर वैष्णवों से महान् बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हम निराकारवादी बन जायेंगे। एकलव्य का उदाहरण हमें यही शिक्षा देता है। किसी भी कार्य में दक्ष बनना गुरू भक्ति का लक्षण नहीं है। गुरूभक्ति का अर्थ है भगवान् के भक्त वैष्णवों के अधीन रहना। उनसे छोटे बनना, बड़े नहीं।

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